यूं DP बदलना छोडो,
सडकों पर निकलना छोडो।
कायरों की भांति मोम अब,
पिघलाना भी छोडो।।
नैन मूंदकर एक दफा ये अहसास करो,
वो मां कैसे रोती होगी,
जिसका बेटा सो गया।।
जिसने सुहाग खो दिया,
वो क्षत्राणी कैसे सोती होगी।
ये जाम करना छोडो,
और बंद करना भी छोडो।।
शहीद होकर अमर हो गया,
सब पर भार चढा गया।
शहादत थी कुर्बानी उसकी,
सभी को ये बतला गया।।
उन खामोश दरख्तों की अब,
जाति बतलाना छोडो।
जो कट गया पट से हिस्सा,
उसे रफू करवाना छोडो।।
यूं DP बदलना छोडो,
सडकों पर निकलना छोडो।।
✍ *पुनीत कुमार 'प्रेम'*
मार्मिक , व्यंग्यात्मक देश भक्ति से ओतप्रोत रचना
ReplyDeleteआभार भाई
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